भारत में आविष्कार और विदेश का नाम ऐसा क्यों - [अंकगणित बीजगणित ज्यामिति और शून्य का सिद्धांत]

भारत देश के प्रत्येक नागरिक को गर्व होना चाहिए और है भी कि हम भारतवर्ष की पावन भूमि में जन्म लिए हैं। 

भारत - यहाँ के ऋषि मुनियों और वैज्ञानिकों ने संसार को सर्वप्रथम अंकगणित, बीजगणित, ज्यामिति और शून्य का सिद्धांत प्रदान किया। 


आर्यभट्ट और ब्रह्मगुप्त - जिन पर टिका है आधुनिक अंक विज्ञान 


आज हम जिस विज्ञान के लिए पश्चिमी देशों का मुँह ताकते हैं वह विज्ञान हमारे आर्य ऋषियों का ही प्रदान किया है परन्तु हमने ही उन सिद्धांतों को भुला दिया इसी का परिणाम है कि आज हमने अंग्रेजी शिक्षा को ही उच्च शिक्षा मान लिया है और डिग्री हासिल करना को हमारे जीवन का लक्ष्य बना लिया है। 


भारत हमारी मातृभूमि तथा संस्कृत समस्त यूरोपीय भाषाओँ की जननी है, भारत ही दर्शनशास्त्र गणित के अधिकांश सिद्धांतों तथा ईसाई धर्म के विचारों का उद्गम स्थल है। स्वराज व लोकतंत्र भी यही की देन है तथा सभी प्रकार से भारत माता हम सब की जननी है। 


भारत देश में गणित का मूल लगभग 4000 वर्ष प्राचीन वैदिक साहित्य में छिपा है, 1000 B.C. तथा 1000 A.D. के मध्य भारतीय गणितज्ञों द्वारा अनेक लेख प्रकाशित किये गए। जैसे 

  • शून्य का विचार 
  • बीजगणित  
  • अल्गोरिथम की तकनीकें 
  • वर्गमूल 
  • घनमूल 
 जिस तरह से भारतियों ने प्रयुक्त विज्ञान जैसे निर्माण तकनीक, वास्तुशास्त्र, तथा जालोप निर्माण आदि का विकास किया है। उसी प्रकार उन्होंने क्षार विज्ञान जैसे गणित और खगोल शास्त्र का भी विकास किया यह अब बड़े पैमाने पर व्यापक रूप से ग्रहण किया जा चूका है कि बीज गणित की तकनीकें तथा शून्य का विचार भारतीयों की ही देन है। 

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भारत में आविष्कार और विदेश का नाम ऐसा क्यों


परन्तु यह जानकार हमें बड़ा ही आश्चर्य होगा कि "ज्यामिति" के मूल सिद्धांत जिन्हे प्राचीन भारत में रेखा गणित कहा जाता है, मंडलों के निर्माण में वास्तु शास्त्रीय उदेश्य हेतु प्रयुक्त किये गएँ जो कि अनेक मंदिरों में ज्यामितीय ढांचे में परिलिक्षित होते हैं। 

यहाँ तक कि गणना करने की यह विधि जो कि वर्तमान में कम्प्यूटर अनुप्रयोग में प्रयुक्त होता है तथा "एल्गोरिथम" कहलाती है। जो अपने भारतीय गणितज्ञों की ही देन है। तो चलिए जानते हैं भारतीय गणितज्ञों की देन को -

बीज गणित (Algebra in hindi)

खगोलीय गणनाओं को आसान बनाने के लिए 5 वी सताब्दी के लगभग गणित का विकास हुआ, उस समय तक इसके अनुप्रयोग खगोल विज्ञान तक ही सिमित था तथा इसके मार्गदर्शक खगोलशास्त्री थे। खगोलीय गणनाये कठिन थी तथा उनमे विभिन्नचरों का प्रयोग होता था जो कि अज्ञात राशियों के घोतक थे बीजगणित गणना का एक आसान तरीका था इसीलिए इसे अंकगणित से उत्तम माना जाता था। 

"बीज" का मतलब अन्य होता है इसलिए इस अन्य गणित को बीजगणित कहा गया। परन्तु कुछ लोगों का "बीज" को ही मूल या मुख्य मानते हैं, एक तथ्य के हिसाब से बीजगणित संगणन का ही एक रूप था। चाहे बीजगणित की उत्पत्ति कहीं से भी हुई हो परन्तु यह तय है कि संगणन की यह विधि भारत की ही देन है। एक गणितज्ञ आर्यभट्ट जो की 5 वी सताब्दी में विद्यमान थे उन्होंने भी अपने अभिलेखों में इस विषय को उल्लेखित किया था। "सिद्धांत शिरोमणि" नामक अभिलेख जो कि 12 वी सताब्दी में प्रकाशित हुआ इसमें एक अध्याय का नाम था बीजगणित। 

इस प्रकार बीजगणित संगणना की विधिया प्राचीनकाल में भारत में ही विकसित की गई, 13 वी सताब्दी के उपरांत भारत में कई आक्रमणकारियों जैसे अरबों एवं स्लामिक प्रजातियों को झेला इन्ही के साथ भारतीय समाज तथा राजनीति का अध्ययन करने वाले इतिहासकार एवं आलोचक जैसे अलबेरुनी आदि भी आये। 

भारतीय गणितीय तंत्र ने उनका ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया, वह समय इस्लामी साहित्य के पुनर्जागरण का काल था तथा अरबी जिस स्थान पर अधिकार करते वहां के कला तथा विज्ञान सम्बन्धी विचारों को अपना लेते थे। उन्होंने जिस तरह भारतीय गणित को ग्रहण किया उसे अब्र-जब्र की संज्ञा दी जिसका अर्थ है बिखरे भागों को पुनर्सगठन। अरबी द्वारा दिया गया यह नाम हमें बताता है कि उन्हें यह सिद्धांत कहीं और से मिले तथा बाद में उन्होंने इसे अपने सिद्धांत में मिश्रत कर लिया। 

10 वी तथा 13 वी शताब्दी के मध्य शासकों ने ईसा मसीह के जन्म स्थान पर विजय प्राप्त करने का प्रयास किया जो कि अरबी शासकों के अधीन था। भले ही वे अपने प्रयत्नों में असफल रहे हो परन्तु इससे अन्य राष्ट्रों में उनका संपर्क स्थापित हुआ और विचारों आदान-प्रदान हुआ तथा इसी काल में बीजगणित की तकनीक पश्चिम में पहुंच गयी यूरोप में पुनर्जागरण तथा तदनन्तर हुई आद्योगिक क्रांति में पूर्व से प्राप्त ज्ञान का विश्लेषण तथा विकास किया गया। 

आज बीजगणित को पश्चिम में "अलजेब्रा" कहा जाता है जो कि उसी अरबों ने भारतीय बीजगणित को दिया था, भारत में आज भी इस विषय के लिए बीजगणित का नाम प्रयोग किया जाता है। सन 1813 में एक अंग्रेज "जेम्स-टेलर" ने भास्कराचार्य की रचना "लीलावती" को अंग्रेजी में अनुवाद किया अगले ही पर्व एक अन्य अंग्रेज खगोल शास्त्री "हेनरी-थॉमस कॉल बुक" द्वारा पुनः उसका अनुवादन किया गया और इस प्रकार भास्कराचार्य की रचना लिखे जानें के 700 वर्ष पश्चात पश्चिमी जगत में फैली जो कि पहले ही अप्रत्यक्ष रूप से अरबी द्वारा पश्चिम में पंहुचा दी गई थी। 

एक आस्ट्रेलियाई भारतीय शास्त्री ए.एल बाह्म ने अपनी रचना "द वंडर देज वाज इण्डिया" में लिखा कि गणितीय विचारधारों के लिए समूचा विश्व भारत का ऋणी है जो कि गुप्त वंश के काल में विकसित की गई। भारतीय गणित की सफलता का श्रेय भारतियों की उस आंकिक विचारधारा को जाता है जो कि वस्तुओं की आकिक मात्रा और स्थानीय विस्तार से पूर्णतः भिन्न है। 

इस प्रकार भारतियों ने उन यूनानियों तथा प्राचीन मिश्र्वासियों के विरुद्ध एक सरल आंकिक औजार बीजगणित ला खड़ा किया जिसकी विचारधारा भौतिक वस्तुओं के तात्कालिक ज्यामितीय परिणामों तक ही सीमित है। 


ज्यामिति एवं एल्गोरिथम (Geometry and Algorithms in hindi)


ज्यामिती के क्षेत्र में भी भारतीय गणितज्ञों का प्रमुख योगदान रहा है। गणितीय अनुप्रयोगों का एक क्षेत्र रेखा गणित कहलाता था। सल्व-सूत्र जिसका अर्थ था - जीवा का नीचम" की सहायता से मंदिरों का निर्माण हुआ, मंदिरों के नमूने मंडल कहलाते थे, इस क्षेत्र में अपस्तम्भ, बौद्धायान, हरिण्यकेसिन मानव, वराह एवं बजुल द्वारा कार्य किये गए। 

एक अरबी विद्वान मोहम्मद इवन जुबेर अल बत्तानी द्वारा रेखा गणित से अनुपात के उपयोग का अध्ययन किया गया तथा उसने अन्य अरबी विद्वानों जैसे अल-ख्वाराज्मी, वशीय तथा अबे मशार आदि का परिचय इन नियमों से करवाया जिन्होंने तत्काल ही ग्रहण की गई बीजगणित का अध्ययन किया था। 

गणित में भारतीय अरबी समिश्रण का प्रमुख कारण "अल-ख्वाराज्मी" था। जिसने गणना करने की विधि भारतीय स्त्रोतों द्वारा खोज की। अल-ख्वाजाराज्मी के पश्चात पश्चिमी लोगों ने उस तकनीक को "अल्गोरिस्मी" नाम दिया जो कि आधुनिक समय में कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर में उपयोगी एल्गोरिथम के नाम से जानी जाती है। 

एल्गोरिथम गणना एक ऐसी तकनीक थी जो पद्धति पर आधारित थी। यह तकनीक उन्ही भारतीय ज्यामितीय संगणनाओं से ली गई जिसका ख्वाराज्मी ने अध्ययन किया था। इसके बाद इसका अनुवाद लैटिन भाषा में किया गया, जिसका शीर्षक था "डी-न्यूमेरो इंडिको" जिसका हिंदी अर्थ है "भारतीय संख्याओं' का और जो कि इस तकनीक के भारतीय मूल संबंधों की पुष्टि करता है। इस अनुवाद का श्रेय 12 वी शताब्दी में ब्रिटेन के बाच नामक कस्बे का निवासी अईलार्ड को दिया जाता है। 

इस प्रकार अल-ख्वाराज्मी तथा अडलार्ड का भारतीय गणीतिय तकनीकों को पश्चिम पहुंचाने में प्रमुख योगदान था। ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी के अनुसार अंग्रेजी भाषा के शब्द एल्गोरिथम का वास्तविक अर्थ था एक व्यक्ति ख्वारिज्म से जो की उसी कस्बे का नाम था जहां अल ख्वाराज्मी निवास करता था। दुर्भाग्य से वर्तमान में जो अभिलेख जिसका ख्वाराज्मी द्वारा अध्ययन किया गया खो चूका है तथा केवल प्रतियां ही उपलब्ध है। 

अतः गणित के क्षेत्र में अरबों में गणित को "हिंदसा" कहां जाता था जिसका अर्थ था भारत में तथा किसी गणितज्ञ या अभियांत्रिकी को अरबी में मुहांदिस कहा जाता था जिसका अर्थ था गणित में निपुण। 


शून्य की धारणा (Assumption of zero in hindi)


शून्य की धारणाएं भी प्राचीन भारत में ही जन्मी थी, यह धारणा बड़ी ही साधारण प्रतीत होती है तथा इसकी खोज के लिए तर्क देना एक अतभुत बात लगती है परन्तु प्रत्यक्ष वस्तु को प्रमाण की आवश्यकता नहीं पड़ती। 

प्राचीन भारत में इस अंक का उपयोग गणनाओं हेतु किया जाता था इसे एक बिंदु द्वारा दर्शाया जाता था तथा इसका अर्थ था "पूज्यम" आज भी इस नाम का प्रयोग सुन्यम के रूप में करते हैं। जिसका अर्थ होता है "रिक्त" परन्तु पूज्यम का अर्थ है "पवित्र" इस प्रकार यह एक आदरणीय है। 

भारतीय दर्शनशास्त्र की एक धारणा थी की तत्व जगत एक छदम माया है तत्व जगत का बहिष्कार त्याग कहलाया तथा मरणोपरांत अस्तित्व से मुक्ति को निर्वाण कहा गया यहाँ नजर आता है कि गणित की शून्यांकि धारणा का एक दर्शनशास्त्री आधार है। 

एक तथ्य के अनुसार शून्य की धारणा का उद्गम "रिक्त" शब्द से हुआ है, जो मूल हिंदी दर्शन शास्त्र में लिखा गया है। यह सम्भव है कि बीजगणित की तकनिकी की भाती शून्य की धारणा भी अरबों द्वारा पश्चिम पहुंच गयी हो, प्राचीन काल में शून्य की अभिव्यक्ति हेतु उपयुक्त रिक्तता की धारणा को शुक्ल तथा शुभ्र कहा गया है। और अरबी शून्य को "शिप्रया सिफ्र" कहते हैं। 

प्राचीन काल में खगोल शास्त्रीय ब्रह्मगुप्त को शून्यांकि धारणा को सर्वप्रथम प्रस्तुत करने का श्रेय दिया जाता है ब्रह्मगुप्त को जिनका जन्म 598 ईस्वी पश्चिमी भारत के गुजरात के "नीलमाला" (अब भीनमाल) में हुआ। कहा जाता है कि उनका नाम एक गणितज्ञ की तरह तब प्रसिद्ध हुआ जब उन्हें 'के व्यग्रमुख' द्वारा दरबार में खगोलशास्त्रीय का पद दिया गया। 

उनके दो अभिलेख मे से पहला बहुत अधिक प्रसिद्ध हुआ 
  • ब्रह्म-सपूत-सिद्धान्त 
  • करणखंड साधका 

यह एक प्राचीन खगोलीय अभिलेख का संसोधित संपादन था, जिसका नाम बहु सिद्धांत था। जिसमे सर्वप्रथम दिए गए शून्य के प्रयोग से दशमलव अंक पद्धति पर प्रकाश डाला, अंकों में शून्य के संयोग से उच्च स्तरीय अंकों को चिन्हित करना संभव हुआ। 

प्राचीन यूनानी तथा बीबियोनियाई तंत्रों में विशाल अंक हेतु अत्यधिक चिन्हों का प्रयोग होता था जिससे अंकन तथा गणना जटिल हो जाती थी। यूनानी अंक पद्धति में 'तीस' के अंक को इस प्रकार दर्शाया जाता था - xxx ठीक इसी प्रकार तैंतीस को इस प्रकार दर्शाते थे xxxiii . इससे स्पष्ट है कि दशमलव तंत्र ने विशाल अंकों की अभिव्यक्त और गणनाओं को सरल बनाया। 

शून्यांकि दशमलव पद्धति के विकाश के अतरिक्त ब्रह्मगुप्त ने अनिवार्य समीकरणों जैसे ax2 + 1 = Y2 का हल दिया अतः उन्हें गणित की एक उच्च धारणा "अंक विश्लेषण" का खोजकर्ता माना जा सकता है। ब्रह्मगुप्त की रचना ब्रहस्पूत सिद्धान्त का अरबी में सिंध हिन्द नामक शीर्षक के अंतर्गत अनुवाद हुआ। 

कई शताब्दियों तक यह अनुवाद ही अरबों के लिए गणितीय ज्ञान का स्त्रोत रहा वह एक भारतीय अभिलेख था जिसके अनुवाद से ही अरबों ने गणितीय सिद्धांतों को संसोधित किया तथा संसार को गणना की वर्तमान तकनीक दी जिसे जिसको अरबी पद्धति कहा गया परन्तु यह वास्तव में भारतीय है। आज भी अंक विज्ञान पर विशेष अनुसंधान हो रहे हैं, यहाँ तक के अंक विज्ञान के माध्यम से पुरे व्यक्तित्व का अध्ययन किया जा सकता है। 

अंतिम शब्द -

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